बुधवार, 6 जुलाई 2011

नाम बताते हैं कि सभी पौराणिक कहानियाँ काल्पनिक हैं


क्या आप अपने घर के किसी सदस्य का नाम चोर रख सकते हैं? या फिर राक्षस, असुर, हिरण्यकश्यप, महिषासुर। नहीं न? क्यों? इसीलिए कि यह सारे नाम खराब हैं। इन नामों से शैतानियत का बोध होता है। फिर किसी समय में कोई अपने पुत्र का नाम रावण(इसका अर्थ है वह जो रुलाता हो), दु:शासन(दु: यानि बुरा) या फिर कुम्भकर्ण कैसे रख सकता है? क्या बुरे लोगों के घर में अच्छे नाम नहीं होते? होते हैं। आखिर इन नामों की बात मैं क्यों कर रहा हूँ? आइए देखते हैं।
      सारे पौराणिक ग्रंथों में ऐसा क्यों हैं कि पात्रों का नाम उनके गुण या आकार के आधार पर रखा गया है? यह सोचने पर मुझे जो लगा वही आप सबके सामने रख रहा हूँ। कितने लोग मुझपर हमले शुरु कर देंगे, लेकिन जरा सोचिये तो ऐसा है क्यों?
      जिन लोगों के नाम पौराणिक ग्रन्थों में हैं वे सब घटना के बाद रखे गए हैं। कहने का मतलब यह कि आज कोई घटना घटी और दस साल बाद मैंने उसपर किताब लिखी तो नाम मैंने उस समय बना लिया। किसी भी राक्षस का या धर्मात्मा का या राजा का नाम आप देख लें। लगभग सारे नाम शरीर या स्वभाव को देखकर रखे गए हैं। किसी के जन्म के समय कैसे यह कहा जा सकता है कि वह भविष्य में कैसा होगा? दुर्योधन का नाम या कुम्भकर्ण का नाम उनके जन्म के समय कोई रख ही नहीं सकता था। दूसरी बात कि क्या किसी के दस या पचास नाम हो सकते हैं? अगर हाँ तो वह निश्चय ही काल्पनिक पात्र है। वह लेखक की कल्पना का उदाहरण है न कि किसी सत्य घटना का। जैसे मैंने एक कल्पना की कि एक आदमी है जिसके कान हाथी इतने बड़े हैं(सोचिए कितनी बड़ी और मजेदार कल्पना है) तो अपनी किताब में मैं  उस पात्र का नाम हस्तीकर्ण रख दूंगा। बस ऐसे ही सारे पौराणिक ग्रन्थों के सभी पात्र और उनके नाम काल्पनिक हैं, यह नामों पर विचार करने से साबित हो जाता है। क्या दु:शासन जन्म लेने के एक क्षण बाद ही बुरा हो गया कि उसका नाम दु:शासन रख दिया गया है? क्या उसकी माता या उसके पिता यह मान जाते कि उनके पुत्र का नाम दु: उपसर्ग से रखा जाय और वह भी बुरे अर्थ में। बुरे अर्थ का मतलब है कि दु: से अच्छे अर्थ वाले शब्द भी तो बन सकते हैं जैसे- दुर्गम, दुर्लभ, दुर्जेय आदि।
      इसलिए मैं कहना चाहता हूँ कि सभी पात्र पहले कल्पना में पैदा हुए हैं और फिर उनका नाम कल्पित स्वभाव या शरीर को आधार बनाकर रखा गया है। और इससे साबित होता है कि ये सारी पौराणिक कहानियाँ काल्पनिक हैं। यानि रामायण, महाभारत सब काल्पनिक हैं। इतना ही नहीं कहानियों में आने वाले नगरों के नाम भी ऐसे ही रखे गए हैं। अभी मैं इस बात पर बहस नहीं करना चाहता कि धर्मग्रन्थों की बातें असत्य हैं या नहीं। क्योंकि इन ग्रन्थों पर बाद में एक बड़ा आलेख लिखने वाला हूँ।

23 टिप्‍पणियां:

  1. इस बार आपसे सहमती है...
    फिर भी जन्म नाम का व्यक्तित्व पर काफी प्रभाव पड़ता रहा है....
    अनजाने में रखे नाम भी कभी-कभी उसे सही प्रमाणित कर देते हैं...
    यथा ... लालू प्रसाद नाम ............ आज जोकर व्यक्तित्व के रूप में याद किया जाता है. इसके साथ भी कई अन्य लक्षण भी जोड़ सकते हैं. अवसरवादिता, चाराखादिता, सत्ताप्रमादिता.
    हाँ नाम कैसे बदल जाते हैं ... इसका उदाहरण भी है ...
    — दिग्विजय ... से बना डोगविजय या पिग्विजय
    इसी तरह वास्तविक नामों से छेड़छाड़ करने का स्वभाव लेखन वर्ग का रहा है.

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  2. दुर्जनपुर और चोर‍हा देवरी जैसे स्‍थान नामों, गरीबा, भुक्‍खड़, बिगाउ, मरहा जैसे व्‍यक्ति नामों पर भी विचार करें.

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  3. दुर्योधन का जन्म का नाम सुयोधन था. ज्योतिराव फुले की पुस्तक से एक उद्धरण (साराँश) नीचे दे रहा हूँ जो पौराणिक कथाओं पर एक विवेक के साथ प्रकाश डालता है :-
    "नृसिंह स्वभाव से लोभी, ढोंगी, विश्वासघाती, कपटी, घातक, निर्दय और क्रूर था. शरीर से सुदृढ़ और बलवान था. राज्य हथियाने के लिए उसने हिरण्यकश्यपु के वध की योजना बनाई. अविकसित बालमन प्रह्लाद के अध्यापक के तौर पर गुप्त रीति से एक द्विज को भेज दिया और उस पर अपने धर्म तत्त्वों का प्रभाव जमा दिया. इसका नतीजा यह हुआ कि प्रह्लाद ने अपने कुल देवता हरहर की पूजा करना बंद कर दिया. हिरण्यकश्यपु ने उसके भटके हुए मन को कुलस्वामी की पूजा की ओर लाने के लिए प्रयास किए परंतु नृसिंह भीतर ही भीतर प्रह्लाद को उकसा रहा था. बालक को इतने झूठे भुलावे दिए गए कि उसके मन में पिता की हत्या करने का विचार आने लगा परंतु साहस नहीं हुआ. अवसर पाकर नृसिंह ने शेर का स्वाँग (मेकअप) करके कलाबत्तू वाली मँहगी साढ़ी पहन ली और हिरण्यकश्यपु के महल के खंभों के बीच छिप गया. शाम को राजपाट का कार्य निपटा कर हिरण्यकश्यपु जब थका-माँदा लौटा और एकाँत में आराम करने के लिए लेटा तब नृसिंह बघनखा लेकर अचानक उसे दबा कर बैठ गया और पेट फाड़ कर उसे मार डाला और स्वयं द्विजों सहित दिन-रात भागता ही चला गया और अपने प्रदेश में पहुँच गया. उधर क्षत्रियों को पता चला कि नृसिंह ने प्रह्लाद को मूर्ख बना कर ऐसा घिनौना कर्म किया है तो उन्होंने आर्यों को द्विज कहना छोड़ दिया और उन्हें विप्रिय कहने लगे. क्षत्रियों ने नृसिंह को नारसिंह जैसा निंदनीय नाम दिया. अंत में हिरण्यकश्यपु के कई पुत्रों ने कई बार प्रयत्न किए कि नारसिंह को बंदी बना कर उसे यथायोग्य दंड दिया जाए, परंतु नारसिंह ने तो हिरण्यकश्यपु का राज्य जीतने की आशा कतई छोड़ दी थी सो वह जैसे-तैसे बचता-बचाता रहा और बाद में आगे कोई उपद्रव किए बिना मृत्यु को प्राप्त हुआ.

    "

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  4. प्रतुल जी,
    नाम का असर आदमी पर हो सकता है, यह तो वैज्ञानिक सत्य नहीं ही है। हाँ, सम्भव है, यह कभी-कभी सच हो जाता है। कितने गरीब लोगों का नाम राजकुमार, राजा आदि होता है।

    राहुल जी,
    आपकी बात पर ध्यान तो देना ही होगा। लेकिन पौराणिक ग्रंथों में अधिकतर मैंने जो देखा है उसे लिखा है। यह विचार भी बहुत जल्दी आ गया था। सुबह सोचा कि आज क्या लिखा जाय? बस अचानक नाम ध्यान में आ गये और लिख दिया। जैसे मेरे गाँव का नाम भी राजाओं के नगर जैसा है। बहुत सारे गाँव तो कहीं-कहीं शहर भी हैं पुर वाले। जैसे मुजफ़्फ़रपुर, समस्तीपुर शहर भी हैं और वहीं गलिमापुर या अन्यपुर गाँव भी हैं।

    भूषण जी,
    कुछ लोग रामायण को सच मानते हुए उसकी कहानियों में अपनी कहानी डाल देते हैं। लेकिन पिछली बात ही मुझे जँचती है कि साहित्य को साहित्य की तरह देखा जाय। ज्योतिबा राव फुले वाली बात नई थी मेरे लिए। जैसे पेरियार ने भी सच्ची रामायण लिखी थी। ये दलित के नाम पर द्वेष का प्रचार ठीक नहीं लगता। क्योंकि ये लोग इतिहासकार नहीं हैं। ग्रन्थों में भरे पागलपन से तो मुझे भी परेशानी है।

    दुर्योधन का नाम सुयोधन था। यह बात शायद दिनकर ने भी कहीं लिखी है। सुयोधन नाम अधिकांश ने सुना होगा लेकिन और नामों के बारे में तो ऐसा नहीं है जैसे दु:शासन का नाम कुछ और है, यह मैं नहीं जानता।

    अन्त में आप सबका आभार जो आपने यहाँ अपने विचार रखे।

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  5. सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई
    पर सहमत नहीं |||

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  6. दमदार और विचारणीय पोस्ट।

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  7. आपकी बात में दम है ....सही तथ्य के करीब है आपकी यह पोस्ट .....!

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  8. @चंदन जी,
    "...ये दलित के नाम पर द्वेष का प्रचार ठीक नहीं लगता। क्योंकि ये लोग इतिहासकार नहीं हैं। ग्रन्थों में भरे पागलपन से तो मुझे भी परेशानी है।'
    आपकी यह टिप्पणी विवेकपूर्ण है. इससे सहमत हूँ.

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  9. कितने गरीब लोगों का नाम राजकुमार, राजा आदि होता है।
    @ विषय के इस पक्ष पर भी चिंतन किया है... तो पाया है
    — यदि किसी गरीब व्यक्ति का नाम 'राजकुमार' जैसा होता भी है तो उसे 'राजकुमार' न बोलकर 'राजू' जैसे संबोधन किये जाते हैं. धनपत राय को धन्नू, लक्ष्मण को लक्खू या लखन, लक्ष्मी का लछमिया जैसे नाम गरिमायुक्त नहीं रह जाते...
    फिर एक मान्यता भी समाज में अधिक प्रचलित रही.. नज़र से बचाने को या टोटके रूप में ... संतान को अज्ञात कारणों से सुरक्षा देने के लिये उनका नाम विपरीत रखा जाता रहा है ...
    सेठ जी ने अपने पोते का नाम रखा दमड़ीलाल, गरीबदास, भिखारीदास ... वैसे भी इन नामों के पीछे वैज्ञानिकता बेशक न हो किन्तु मनोवैज्ञानिकता भरपूर असरकारक रूप से विद्यमान है.

    दूसरी बात :
    कई जगह समझ कार्य नहीं करती.
    उडीसा का एक परिवार कुछ वर्षों मेरे मित्र के किरायेदार के रूप में रहा.
    नाम था ........ दुश्सासन.. [अंतिम नाम में कन्फ्यूजन है .. शायद 'प्रधान' था.]
    पत्नी का नाम था .......... द्रोपदी.
    वे शायद नहीं जानते थे कि महाभारत में इन नामों का क्या स्थान है. शायद जानते भी हों लेकिन उनका विवाह होना तो संयोग मात्र है.

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  10. नाम रखना मानसिकता पर भी निर्भर करता है.

    आजकल कई परिवार बड़ी शान से अपने बच्चे का नाम 'ओसामा', 'सद्दाम' रखते हैं..
    और बड़े ऊँचे स्वर में 'लादेन' और 'दाउद' पुकारते हैं. आप मुस्लिम पिछड़ी बस्तियों में जायेंगे तो इस तरह के स्वर सुने जा सकते हैं.
    इसी तरह झुग्गी-बस्तियों में 'खलनायकों' के नाम बड़े प्रेम से उच्चारे जाते हैं.

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  11. वे क्या जानें 'नैतिकता', 'मूल्य' और 'आदर्श'
    उन्हें क्या लेना-देना 'सभ्यता और संस्कृति से'

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  12. पौराणिक कहानियाँ बेशक काल्पनिक हों किन्तु 'रामायण' 'महाभारत' और उनसे सम्बंधित ग्रन्ध पुराणों के अंतर्गत नहीं आते.

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  13. बात तो आपकी सही है.खलनायक की भूमिकाओं से मशहूर हो चुके अभिनेता प्राण के नाम पर भी लोग अपने बच्चे का नाम प्राण नहीं रखते.मुझे भी पौराणिक कहानियाँ हमेशा काल्पनिक ही लगी है.

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  14. प्रतुल जी,
    रामायण और महाभारत का मूल तो पुराणों में ही है। रामायण तो निश्चय ही है, महाभारत पर दावा नहीं कर सकता।

    सेठ के यहाँ उलटे नाम रखे जा सकते हैं लेकिन ऐसे लोगों की या इस अपशगुन की सम्भावना कितनी है? लेकिन पौराणिक कहानियों में सभी असुर अपशगुन के शिकार हो जायँ, यह तो सम्भव नहीं। एक उदाहरण मेघनाद भी है। वह जन्म लेते ही तो बादलों की तरह गरजती आवाज में नहीं बोलता होगा। उसका नाम मेघनाद भी काल्पनिक ही है।

    जहाँ लोग समझते ही नहीं हैं जैसाकि आपने बताया है पिछड़ी बस्तियों में ऐसे नाम भी रखे जाते हैं जैसे लादेन। लादेन या दाऊद तो बहुत नया नाम है। इसका बुरा अर्थ अब बन गया है। हमारी चर्चा में वैसे लोग थोड़े ही शामिल हैं जिन्हें सभ्यता का पता ही न हो।

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    1. Shayad apne dhyan se nhi padha mujhe lagta hai aap sirf dharm grantho me kami nikalne ke liye hi unhe padte hai

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    2. Shayad apne dhyan se nhi padha mujhe lagta hai aap sirf dharm grantho me kami nikalne ke liye hi unhe padte hai

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  15. पुराण रामायण और महाभारत के बाद लिखे गए हैं।

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  16. मेरे पास भी पूरे साक्ष्य हैं पुराण को अर्वाचीन सिद्ध करने के. आप चाहें तो फादर कामिल बुल्के कृत शोध ग्रन्ध 'रामकथा' पढ़ सकते हैं.
    समय मिलते ही ... पूरा विवरण दूँगा. अतिरिक्त जानकारी भी.

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  17. एक समय में बहुत अच्छे रजा हुए थे. उन्होंने पुरानो को फेंक दिया... वेद भी उन्होंने छोड़ दिए. क्योंकि उसमे कर्मकांड और ज्ञानकाण्ड ऐसे दो अंगा थे. उपनिषद हालाँकि उनको अच्छे लगे कुछ तौर पर. फिरभी उनमे कुछ तोड़-जोड़ की गयी थी. ये सब मनु और अभिसंगा की थी. यही उपनिशादोसे जाकर वेदान्त फिलोसोफी का जन्मा हुआ.
    Source (sacerd book of the east by Max Muller and others)

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  18. मेरे विचार से, हिन्दु पौराणिक ग्रन्थों व कहानियों को इस प्रकार रचा गया है कि सभी अच्छे पढ़े-लिखे तथाकथित ज्ञानी लोग जितना ही इसे जानने का प्रयास करेंगे, उतना ही इसमें उलझते चले जाएंगे । ये ऐसा मक्कङ जाल है जिसमें संवेदनशील लोग ही प्रवेश करने का प्रयास / साहस करेंगे और उसमें फंसते चले जाएंगे । यदि आपका उद्देश्य किसी सामाजिक परिवर्तन अथवा क्राँती का नहीं है, अपने भरण पोषण के लिए धन अर्जित करने का है तब तो ठीक है अन्यथा इसे मानने के अतिरिक्त एक ही उपाय है इसे छोङ दें ।
    यदि आप ना भी उलझे तो प्याज के छिलकों को छिलते रहने के बाद बनावटी आसूँओं के अतिरिक्त कुछ न पाएँगे ।
    जिस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति ताउम्र माँ व ममतामयी भावनाओं से जुङा रहता है, उसी प्रकार उसे झूटी-सच्ची कहानियाँ हर उम्र में भाती है, बचपन में दादा-दादी, नाना-नानी के मुख से व जीवन पर्यन्त किसी न किसी अन्य माध्यम से - किताब, समाचार पत्र, रेडियो, सिनेमा, टेलिवीजन ।

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  19. Pauranik kathano ke kuchh khalnayakon ke achchhe naam: Madhu, Kaitabh ,Shumbh ,Nishumbh ,Hiranyakashyapu, Hiranyaksh ,Akshay Kumar ,Bali,
    Shishupal,Zarasandh,Shakuni,Shalya, Ashwaththama, Jaydrath, Lakshman(Duryodhan ka putra),Shahatrarjun .
    ,
    Achchhe charitron ke bure naam :Vibhishan, Trijata,Durwasha,

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  20. मुर्खतापुर्ण तथा nonscence लेख लिखा है , शर्म आनी चाहिए तुम्हे , सच्चाई को समझने के बजाय उस पर प्रश्न उठाना मुर्ख तथा दुष्टो का परिचायक है !

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