शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

अमिताभ वाली 'नास्तिक' और नास्तिकों का अपमान

21 जून को हिन्दी फ़िल्मों पर कुछ विचार लिखकर रखे, जिनमें भाषा, कथा आदि पर अपना पक्ष रखने की कोशिश थी। उसी लेख के संपादित और परिवर्धित रूप को तीन हिस्सों में यहाँ बाँट रहा हूँ। आज दूसरा हिस्सा प्रस्तुत है।

फिल्मों पर लिखे लेख के पहले भाग पर एक मित्र ने ग़ुलामी का ज़िक्र किया है। ग़ुलामी फ़िल्म में धर्मेन्द्र और मिथुन की मुख्य भूमिका थी। उसमें धर्मेन्द्र को मैक्सिम गोर्की की माँ पढ़ते दिखाया गया है और ज़मीनदारी से लड़ने के क्रम में अंत में सारे ज़मीनी दस्तावेज़ों या कागज़ातों को जलाते हुए भी दिखाया गया है। फ़िल्मों में जो जनपक्षधरता दिखाई गई है, वह सुधारवाद या अंशतः मार्क्सवाद को छूती नज़र आती है। मार्क्सवाद के साथ एक रात गुज़ारने, उसके बगल से कटते हुए निकलने का उदाहरण फ़िल्मों में ज़रूर कई बार आया है, लेकिन लेनिन या चे जैसी दृढता और सिद्धान्तनिष्ठा नहीं दिखाई गई। एक साधारण आदमी जो थोड़ा भी सोचेगा, वह यह कह सकता है ग़रीबी समाप्त होनी चाहिए, बेहतर जीवन जीने का अधिकार सबको मिलना चाहिए, यही सारी बाते गाँधी जी जैसे लोग भी करते हैं और मार्क्स भी, भगतसिंह भी, लोहिया भी। अंतर इतना है कि वामपंथ (यहाँ लिखते समय यह शब्द मुझे अच्छा नहीं लग रहा) के अनुसार जिस क़िस्म के विकास की बात होती है, वह फ़िल्मों में नहीं दिखाया जाता। मार्क्सवाद के साथ एक रात गुज़ारने और मार्क्सवादी होने में अंतर तो ज़रूर है। एक व्यक्ति जो हिन्दू है, जाति से ब्राह्मण है और माँसाहारी है, सिर्फ़ माँसाहारी होने मात्र से वह ईसाई नहीं हो जाता। पूरे तौर पर अनीश्वरवादी और मार्क्सवादी व्यक्ति को नहीं दिखाया जाने का प्रश्न मेरे इस लेख का केंद्रीय विषय था। और हमारे यहाँ तो ऊपर से कुछ वामपंथी दिखनेवाली फ़िल्में भी धर्म के चंगुल से मुक्त नहीं दिखाई जातीं। यहाँ फ़िल्मों में वामपंथ के नज़दीक दिखनेवाले पात्रों पर ईश्वरीय दासता थोपना भी तो एक शग़ल रहा है। देव आनंद की मशहूर फ़िल्म गाईड अंत में आध्यात्मिक बन जाती है, ऐसे ही फ़िल्मों में नायकों के संघर्ष को सामूहिक संघर्ष दिखाया भी गया तो, उसे धार्मिक रंग चढा ही दिया गया।
   अब आज उसी लेख का दूसरा हिस्सा- 

नास्तिक और नास्तिकों का अपमान

   एक फ़िल्म आई थी नास्तिक। इस फ़िल्म में जानबूझकर अपनी मर्जी की काल्पनिक कथा के ज़रिये नास्तिकों का अपमान किया गया। नास्तिक भी नक़ली क़िस्म का। आज के दिन भारत में किसी भी विषय पर फ़िल्म बने, तो लोग या कोई समुदाय आहत होने लगता है, हल्ला मचाने लगता है, लेकिन नास्तिकों के अपमान से युक्त इस फ़िल्म के ख़िलाफ़ कोई जंग नहीं छेड़कर नास्तिकों ने अपनी शांतिप्रियता और सनकी नहीं होने का परिचय दिया था। भारत में फ़िल्मों के नायक दृढतापूर्वक नास्तिक होनेवाले लोग भी नहीं रहे। आख़िर क्या वजह है कि भारत के फ़िल्म निर्माताओं के अबतक कम-से-कम 5-7 हजार फ़िल्मों को बना लेने के बाद भी दार्शनिक आधार के साथ (फ़ैशनबाज और फ़ैशन के लिए धार्मिकों और धर्म का मज़ाक उड़ानेवालों का कोई दार्शनिक आधार शायद ही होता है) नास्तिकता में जीनेवाले व्यक्ति को फ़िल्म का नायक नहीं बनाया गया। भारत में फ़िल्मों में नास्तिक दिखाए गए तो क्रूर क़िस्म के, खलनायकी चरित्र वाले, बुरे काम करनेवाले बनाकर।
   यहाँ फ़िल्म के लिए नायिका और गीतों के साथ प्रायः प्रेमगीतो का होना लगभग आवश्यक शर्त-सी रहा है। लेकिन नास्तिक क्या इतना क्रूर होता है, जो प्रेम नहीं कर सकता, प्रेमगीत नहीं गा सकता! भवन, भाषा, भूषा और भोजन, इन तीनों के एकदम आधुनिक हो जाने के बाद भी भारतीय फ़िल्मों में अभी नास्तिकता को प्रस्तुत कर पाना मुश्किल रहा है।
   नास्तिक फ़िल्म में एक रुष्ट भक्त या दास की तरह अमिताभ को दिखाकर नास्तिकों और नास्तिकता को तनिक भी नहीं समझ सकने और अपने काल्पनिक और दोषपूर्ण समझ को लोगों के सामने रखने की ग़लती नास्तिक फ़िल्म के द्वारा की गई थी।

धर्म, चमत्कार, भाग्य और संयोगों से भरी फ़िल्में

हिन्दी फ़िल्मों में धर्म और चमत्कार, भाग्य या संयोगों की अधिकता और प्रबलता भी जमकर दिखाए जाते रहे हैं। ख़ासकर नायकों की माँ, पत्नी या प्रेमिका का दुर्गा, शंकर आदि के मंदिर में प्रार्थना करना, सिर पटकपटक कर रक्षा की गुहार लगाना, या फिर जंतर पहनना आदि दिखाकर तिलिस्मी कहानियों-सी अयथार्थता का ख़ूब प्रदर्शन किया जाता रहा है। आरती, पूजा आदि के बाद देवताओं की मूर्तिओं की ओर से फूल, हथियार का गिरना या किसी अन्य संकेत का मिलना, जिससे खलनायक का पता चल सके या फिर भक्त ठीक हो सके, एक साधारण घटना के रूप में फ़िल्मों में दिखाए जाते रहे हैं। अमर अकबर एंथोनी में ईसाई गिरजे में अमिताभ की ओर जो संकेत प्राप्त होता है, वह ईसाई का (यहाँ सिर्फ़ हिन्दुओं के चमत्कारों की बात की जा रही है, ऐसा न समझा जाय) या फिर कई फ़िल्मों में अल्लाह, ताबीज़ या इस्लाम का चमत्कार भी दिखाया जाता रहा है। पता नहीं क्यों हिन्दी फ़िल्मों के नायकों और नायिकाओं पर (जो प्रायः समृद्ध परिवारों के होते हैं) भगवानों की इतनी मेहरबानी क्यों है! धार्मिक फ़िल्मों की तो बात यहाँ करनी ही नहीं।
   एक बार मैंने सोचा कि ऐसी कितनी फ़िल्में हैं जिनमें भाग्य या संयोग का चमत्कार नहीं दिखाया गया है, तो एक फ़िल्म मुग़ल-ए-आज़म (अगर मैं सही याद कर पा रहा हूँ तब यही फ़िल्म)  के सिवा मैं कोई फ़िल्म ढूँढ न सका। यह हो सकता है कि और बहुत सारी फ़िल्मों में भाग्य का खेल नहीं के बराबर या नहीं खेला गया होगा, लेकिन मैं उन्हें नहीं ढूँढ सका। संयोगों या भाग्य के खेल से मेरा मतलब यह है कि नायक या नायिका के जीवन में ऐसी घटनाएँ घटती हों, जो वास्तविक जीवन में 16 आने में 4 आने ही हो पाती हैं। जैसे- बेटों का बिछुड़ना और 20-30 साल बाद माँ-बाप सबका फिर से एक जगह हो जाना (उदाहरण- वक़्त फ़िल्म, जिसमें ऐ मेरी जोहराजबीं वाला गीत है), नायिका के ऊपर बलात्कार का ख़तरा अंतिम चरण तक मँडराना और उसका उसके भाई, प्रेमी आदि के द्वारा बचा लिया जाना (ऐसी फ़िल्में भी हैं, जिनमें नायिका के बलात्कार से बचाया नहीं जा सका, ताकि बदला लेना कथा का महत्वपूर्ण भाग बन सके। लेकिन उसी फ़िल्म में दूसरी बहुत-सी जगहों पर संयोगों का ज़बरदस्त प्रभाव दिखा है।), नायकों का गुंडों से (वह भी अकेले 20-30 या अधिक से) लड़ना और अंतिम स्थिति में नायक का बच निकलना, बहुत ज़्यादा ऐक्शन और मारधाड़ के बाद भी हाथी के शरीर पर गेंद जैसी चोट होना, नायक के बेटे, भतीजे आदि का ऊँचाई से फेंका जाना लेकिन, उसे बचा लिया जाना जैसे बहुत सारे भाग्य के खेलों से फ़िल्में भरी हुई हैं।
निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि हिन्दी फ़िल्मों का नायक महाशक्तिशाली (सुपरमैन) और भगवान् का अत्यंत प्रिय तो रहा ही है। 

3 टिप्‍पणियां:

  1. फिल्‍में, हमारे मन की फंतासी को रूप तो देती ही हैं, समाज को भी प्रतिबिंबित करती हैं.

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  2. बॉलीवुड की फिल्में बहुत मुद्दे उठाती हैं लेकिन ग़रीबी के संघर्ष के मुद्दे नहीं उठाती. पैसा बढ़िया सपने दिखाने से आता है, वास्तविकता दिखाने से नहीं. इसे आप समाज को दी गई अफीम के साइड इफैक्ट के रूप में भी देख सकते हैं. बढ़िया आलेख.

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  3. मुगले आजम में भी अकबर का बेटा मजार पर प्रार्थना के बाद होना बताया गया है। यह भी एक चमत्कार ही है!

    लेख बढिया है।

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